Home अपना उत्तराखंड दून अस्पताल: सीनियर चिकित्सक को ओपीडी से किया निष्कासित…

दून अस्पताल: सीनियर चिकित्सक को ओपीडी से किया निष्कासित…

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देहरादून: अस्पताल में सुविधा होने के बावजूद मरीज की जांच बाहर से कराने वाले चिकित्सक पर दून मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने कार्रवाई की है। सर्जरी विभाग के सीनियर रेजिडेंट डॉ. अंकित जैन को अगले 15 दिन के लिए ओपीडी से निष्कासित कर दिया गया है। इस दौरान वह चिकित्सा अधीक्षक के कार्यालय से संबद्ध रहेंगे। उन्हें सख्त ताकीद की गई कि आइंदा शिकायत मिली तो तत्काल उनकी सेवा समाप्त कर दी जाएगी।

बता दें, बीते बुधवार कारगी निवासी भोलादत्त सर्जन डॉ. अंकित जैन के पास पहुंचे। उनसे परामर्श लिया तो चिकित्सक ने एफएनएसी टेस्ट कराने की सलाह दी। इस पर उन्होंने पूछा कि दून अस्पताल में यह टेस्ट होता है तो उत्तर चौंकाने वाला था।

डॉक्टर ने कहा होता तो है, लेकिन ठीक तरह से नहीं होता। लिहाजा, आप बाहर से टेस्ट करा लें। डॉक्टर से लैब का पता पूछा तो उन्होंने फट से एक पर्ची निकालकर दे दी, जिस पर लैब तक पहुंचने का नक्शा भी छपा हुआ था। यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन डॉक्टर साहब तो इससे भी आगे बढ़ गए। कहने लगे कि एक बार यह पर्ची दिखाओगे तो वो समझ जाएंगे कि डॉक्टर जैन ने भेजा है।

दैनिक जागरण ने यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित की थी। इसके बाद कॉलेज प्रशासन भी हरकत में दिखाई दिया। प्राचार्य डॉ. आशुतोष सयाना ने विभागाध्यक्ष को मामले की जांच कर रिपोर्ट मांगी। जिसमें इस बात की पुष्टि हुई कि चिकित्सक ने मरीज को जानबूझकर निजी लैब में भेजा।

इस पर प्राचार्य ने चिकित्सक को 15 दिन के लिए ओपीडी से निष्कासित कर दिया है। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. केके टम्टा ने मामले की जानकारी देते बताया कि अगले एक पखवाड़े तक चिकित्सक न ओपीडी करेंगे और न ऑपरेशन करेंगे। वह उनके कार्यालय से संबद्ध रहेंगे। मरीज को बाहर से दवा व जांच लिखने वाले अन्य डॉक्टर भी इससे सबक लें। अन्यथा कठोर कार्रवाई की जाएगी।

अब सख्ती से लागू होगा क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट

चुनावी खुमारी उतरने के साथ ही प्रदेश में क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को लेकर सख्ती शुरू हो गई है। स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. रविंद्र थपलियाल ने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को इसे कड़ाई से लागू करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में एक्ट लागू होने के बावजूद इसका समुचित रूप से क्रियान्वयन न होना स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार में एक बड़ी बाधा है।

स्वास्थ्य महानिदेशालय में आयोजित कार्यशाला में उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार 70 प्रतिशत मरीजों का उपचार निजी क्षेत्र के चिकित्सकों के द्वारा किया जा रहा है। जबकि 40 फीसदी मरीजों का उपचार अप्रशिक्षित मेडिकल प्रैक्टिशनर कर रहे हैं। इससे मरीजों की जान का जोखिम बढ़ जाता है। ऐसे में एक्ट का कड़ाई से पालन कराना आवश्यक है।

महानिदेशक ने एक्ट के प्रावधानों के तहत मुख्य चिकित्साधिकारियों के अधिकारों का उल्लेख किया। यह निर्देश दिए कि डिस्ट्रिक्ट रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी को नियमों के उल्लंघन की शिकायतों की जांच एवं दंडात्मक कार्रवाई अमल में लानी चाहिए।

निदेशक स्वास्थ्य डॉ. आरके पांडेय ने बताया कि कोई भी प्रशिक्षित चिकित्सक किसी भी नर्सिंग होम, क्लीनिक, अस्पताल या चिकित्सा संस्थान का एक्ट में पंजीकरण कराए बिना प्रैक्टिस या चिकित्सकीय कार्य नहीं कर सकता। उपचार के लिए लिए जाने वाले शुल्क की जानकारी सूचना पट पर प्रदर्शित करना अनिवार्य है। इससे अधिक शुल्क लेने पर संस्थान दंड का भागीदार होगा। दंड की रकम का भुगतान न किए जाने पर इसे भू-राजस्व के बकाये के रूप में वसूल किया जा सकता है।

एनएचएम के प्रभारी अधिकारी डॉ. कुलदीप सिंह मर्तोलिया ने कहा कि एक्ट के क्रियान्वयन से राज्य के अंतर्गत निजी क्षेत्र में कार्य कर रहे क्लीनिक-अस्पतालों की संख्या पता चल जाएगी। इससे झोलाछाप की पहचान कर एक्ट के अनुसार कार्रवाई की जा सकेगी। उन्होंने बताया कि एक्ट के तहत शिक्षित एवं अनुभवी नर्सिंग, टेक्नीशियन व पैरा मेडिकल स्टाफ की नियुक्ति अनिवार्य है।

इस दौरान डॉ. अमिता उप्रेती, डॉ. अंजलि नौटियाल, डॉ. तृप्ति बहुगुणा समेत महानिदेशालय के अन्य अधिकारी और सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारी मौजूद रहे।