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20 साल पहले पाकिस्तान जेल से आई भारतीय सैनिकों की चिट्ठी आपको रुला देगी!

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1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान 54 भारतीय सैनिक लापता हो गए थे।लापता सैनिकों के परिवारों को उनके बारे में आजतक कोई जानकारी नहीं है। हाल ही में एक आरटीआई से खुलासा हुआ कि इसकी एक बड़ी वजह सरकार की नाकामी भी है।

नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच 2 बार युद्ध हुए। पहला युद्ध 1965 तो दूसरा 1971 में। हालांकि दोनों ही युद्धों में विजय भारत की हुई, लेकिन इस दौरान भारत के 54 सैनिक लापता हो गए। विजय दिवस भले ही मनाए जाते हों, लेकिन इस बात को याद रखना जरूरी हो जाता है कि युद्ध सिर्फ बर्बादी देता है और इसी बर्बादी का एक अंश था 54 सैनिकों का लापता हो जाना।

’54 लापता सैनिकों को भारतीय सरकार छुड़वाने में नाकाम रही’

सैनिकों के नाम पर अक्सर ही राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती हैं, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि असल में सरकारें आर्मी के लिए कितना करती हैं? हाल ही में एक आरटीआई के जवाब से खुलासा हुआ कि 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान लापता 54 सैनिकों को अब तक भारतीय सरकार छुड़वाने में नाकाम रही। सालों बीत जाने के बाद भी लापता सैनिकों के बारे में परिवारों को कोई जानकारी नहीं है।

‘चिट्ठी पढ़कर रूह रोई थी’

उन्हीं लापता सैनिकों में से एक मेजर कंवलजीत भी थे, जिन्हें पाकिस्तान ने कोट लखपत जेल में बंदी बना रखा था। आखिरी बार करीब 20 साल पहले पाक जेल से एक चिट्ठी आई। लिखा था- “हमें यहां पर तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही हैं, जिसकी वजह से कई सैनिक तो पागल हो चुके हैं और कई पागल होने की कगार पर हैं। हमें यहां से जल्दी निकालिए।”

‘सरकार की नाकामी’

उसके बाद से परिवार वालों को ये तक नहीं पता कि अब वो लोग जिंदा भी हैं या नहीं। आरोप है कि भारतीय सरकार अभी तक उन्हें छुड़ाने में नाकाम रही है। भारत सरकार ने एक अभिनंदन को तो छुड़वा लिया, लेकिन अभी भी पाकिस्तान की जेलों में आरटीआई के जवाब के अनुसार 54 अभिनंदन बन्द हैं, जिन्हें छुड़वाने के लिए सरकार कोई सख्त कार्रवाई नहीं कर सकी। जिसकी वजह से वो पाक जेलों में तरह-तरह की यातनायें झेलते रहे और शायद आज भी झेल रहे होंगे।

आरटीआई में पूछे गए सवाल

आरटीआई एक्टिविस्ट हरपाल राणा ने बताया कि वो पिछले कई साल से आरटीआई लगाकर 1965 और 1971 की भारत-पाक लड़ाई के दौरान लापता भारतीय सैनिकों की सूची मांग रहे थे. उन्हें सरकार की ओर से इसमें कोई जानकारी नहीं दी जा रही थी। आखिरी बार उन्होंने जनवरी 2019 में आरटीआई लगाकर सरकार से जानना चाहा की 1965 और 71 के भारत पाकिस्तान लड़ाई के दौरान लापता भारतीय सैनिकों का क्या हुआ? कितने सैनिकों को सरकार ने अब तक छुड़ाया है? क्या सरकार के पास जानकारी है कि कितने भारतीय सैनिक पाकिस्तान में बंदी हैं और उनकी क्या हालत है?

ये मिला जवाब

कई साल की कोशिश के बाद हरपाल राणा के पास 28 फरवरी 2019 को भारत के रक्षा मंत्रालय की तरफ से जवाब आया कि 1965 और 71 के भारत-पाक लड़ाई के दौरान 54 भारतीय सैनिक लापता हुए हैं। साथ ही बताया गया कि साल 2007 में भारतीय प्रतिनिधिमंडल सैनिकों के परिवार के लोगों के साथ पाक जेलों में अपनों की तलाश के लिए गया था, लेकिन भारतीय सैनिक वहां वहीं मिले थे। अभी तक न तो सरकार के पास और न ही परिवार के पास ये जानकारी है कि लापता भारतीय सैनिक अभी तक जिंदा हैं या सभी पाकिस्तनी जेलो में मारे गए।

नहीं मिला शहीद का दर्जा

बता दें कि सरकार की तरफ से उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया गया और ना ही सेना की ओर से उनका फंड और पेंशन पूरी तरह से परिवार को मिल पा रही है। इस बारे में आरटीआई एक्टिविस्ट हरपाल राणा ने परिवार से मिलकर जानकारी ली। जब उन्होंने कई परिवारों से मुलाकात की तो पता चला कि अभी तक सैनिकों को शहीद का दर्जा नहीं मिला है। पाकिस्तान जेलों में बंद भारतीय सैनिकों ने कई बार चिट्ठी भी लिखी, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान द्वारा यातनायें दी जाने की बात लिखी। आरटीआई एक्टिविस्ट हरपाल राणा के अनुसार पाक जेलों से परिवार के पास चिट्ठी आई थी, जिसमें लिखा था कि उन्हें जेल के अंदर बने तहखानों में रखा जा रहा है।

छोड़ दिए थे 90,000 पाक सैनिक

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 90,000 पाक सैनिकों को वापस बिना किसी शर्त के छोड़ दिया था, लेकिन अपने 54 सैनिकों को छुड़वाने में नाकाम रही। आरटीआई एक्टिविस्ट ने भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय से युद्ध के दौरान बनाए गए बन्दी सैनिकों के बारे में कई और भी बातें भी जाननी चाही।

सरकार उठाए कदम

पाकिस्तान जेलों में अब जितने भी युद्ध बंदी बचे हैं, उनके बारे में हरपाल राणा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राष्ट्रपति को पत्र लिखकर उन्हें छुड़ाने के संदर्भ में बात करेंगे। साथ ही जो भी युद्ध बंदी सैनिक पाकिस्तानी जेलों में मारे जा चुके हैं, उनके बारे में परिवार को जानकारी दी जाए और परिवारों को फंड और पेंशन दी जाए।

बात जरा सी है… युद्ध अपने पीछे चीख-पुकार के सिवा कुछ नहीं छोड़ता. इन सब बातों में साहिर लुधियानवी की एक नज्म याद आती है…

“बम घरों पर गिरें कि सरहद पर,

रूह-ए-तामीर जख्म खाती है।

खेत अपने जलें कि औरों के,

जीस्त फाकों से तिलमिलाती है।

टैंक आगे बढ़ें कि पिछे हटें,

कोख धरती की बांझ होती है।

फतह का जश्न हो कि हार का सोग,

जिंदगी मय्यतों पे रोती है।”