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विश्व पर्यावरण दिवस 2019: प्रकृति को चुनौती देने का मतलब अपने विनाश को निमंत्रण देना- अनिल जोशी

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हिमालय देश की पारिस्थितिकी राजधानी कही जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सरल सी बात है, जब दिल्ली जो राजनीति का गढ़ है और मुंबई वित्तीय संबंधित हलचलों का तो स्वत: ही जहां से हवा पानी मिट्टी पनपते हों उसे ये सम्मान मिलना ही चाहिए। हिमालयीय क्षेत्र में उत्तराखंड प्रमुख पहाड़ी राज्य है। इसलिए ही नहीं कि यहां केदारनाथ धाम में भगवान शिव व बदरीनाथ धाम में भगवान विष्णु का वास हैं, इसलिए कि गंगा व यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों का उद्गम स्थल भी देवभूमि में ही है।

देश का सबसे बड़ा ग्लेशियर गंगोत्री यहीं है तो वनाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं इसी राज्य का हिस्सा हैं। मतलब यह राज्य देश में अपनी अलौकिक प्रकृति और पारिस्थितिकी का केंद्र है। इन सबके बावजूद कहीं पर्यावरण की दृष्टि से सब कुछ ठीक नहीं है। यहां भी प्रकृति को जोड़कर विकास की शैली नहीं अपनाई गई है। सड़कों और बांधों को अगर प्रभु के बाद परम आवश्यक मान लिया जाए तो कुछ समझौतों का रास्ता भी खोजा जा सकता था। मसलन बांधों की कतार के साथ छोटे-छोटे स्तर के जल उत्पादन केंद्र स्थापित होंगे तो स्थानीय नियंत्रण तो पड़ेगा ही पर साथ में पारिस्थितिकी पर हमला होगा। हम छोटे-छोटे प्रयोगों के पक्ष में नहीं रहते जो स्थायी भी होते हैं और पारिस्थितिकी पर बोझ नहीं बनते।

सड़कों को ही देखिये अब सारी दुनिया में सड़कें हमारे यहां ही नहीं बनती, दूसरे देशों में पहाड़ों में सड़क और संवर्धन को जोड़कर देखा जाता है। मतलब सड़क बनाने के साथ साथ जल, जंगल का विशेष ख्याल रखा जाता है। इतना ही नहीं दुनिया में विकास की अब एक नई शैली तय की जा रही है जो विकास के नए आयाम तय कर रही है। जहां वे एक तरफ  बड़े बांधों से मुक्त होंगे, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा जुटाने में जुटे हैं। सजग समाज समय पर सही निर्णय ले लेता है। उदाहरण के लिए विकसित देश कई तरह की ऐसी विकास योजनाओं में जुटे हैं, जिनसे प्रदूषण न हो। स्वच्छता इन देशों का मूलमंत्र है वह चाहे घर की सड़क हो या शहर की। उस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। हम पश्चिमी शैली के इस पहलू से पूरी तरह दूर हैं और विकास की उस लीक से जुड़ रहे हैं जो विनाश के मार्ग पर ले जा रही है।

विकास और पर्यावरण दोनों ही मनुष्य और समाज के लिए
दरअसल, हम प्राकृतिक आपदाओं, पर्यावरण परिवर्तन को अपने अनियोजित विकास के साथ जोड़कर नहीं देखते या बहस को उस तरफ नहीं ले जाना चाहते। इससे पक्ष और विपक्ष के सुर छिड़ जाते हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विकास और पर्यावरण दोनों ही मनुष्य और समाज के लिए ही हैं। दोनों को जोड़कर चलना ही अब हमारे हित में होगा। केदारनाथ त्रासदी हो या हालिया गैरसैंण या अल्मोड़ा में बादल फटने घटना हो, गर्मी-सर्दी का रुख बदलना हो तब तक हमारी समझ से दूर होंगे और हम हमेशा की तरह परिस्थितियों को बिगाड़ने में ही उतारू होंगे। यह समझ लेना जरूरी है कि विकास सुविधाओं का दूसरा नाम है, पर पर्यावरण पारिस्थितिकी सीधे प्राणों से जुड़ी है।

वैसे भी उत्तराखंड का पर्यावरण मात्र स्थानीय निवासियों के लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए मायने रखता है क्योंकि यहां से पानी, मिट्टी, हवा देश को जिंदा रखती है। इसकी पारिस्थितिकी पर गहन चिंतन का भी समय है। अन्यथा साल 2013 में भगवान शिव ने केदारनाथ में जो भृकुटि तानी थी और फिर न जाने कब प्रभु एक बार और तांडव करेंगे, इसका पता नहीं। मतलब साफ है प्रकृति और प्रभु में कोई अंतर नहीं दोनों को चुनौती देने का मतलब अपने विनाश को निमंत्रण देना है।

देश-दुनिया में पर्यावरण में तेजी से हो रहा बदलाव चिंता का विषय है। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके इस बार की थीम ‘बीट द एयर पॉल्यूशन’ है। ऐसे में हम सबको वायु प्रदूषण के प्रति सचेत होना होगा। वैसे तो देश-दुनिया की जैव विविधता व पर्यावरण के संरक्षण में उत्तराखंड का विशेष योगदान है। कार्बन स्टॉक को लेकर उत्तराखंड अहम भूमिका अदा करता है। केेंद्र व राज्य सरकार के स्तर पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन आमजन की सहभागिता के बगैर बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है।
– डॉ. हरक सिंह रावत, वन मंत्री, उत्तराखंड सरकार 

पर्यावरण को लेकर जिन तरीके से पूरी दुनिया में खतरा मंडरा रहा है। उसे देखते हुए पर्यावरण संरक्षण को लेकर और अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है। पर्यावरण संरक्षण महज सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं रहा जा सकता है। इसके लिए समाज के हर वर्ग के लोगों को जागरूक होगा। पर्यावरण संरक्षण को लेकर समय रहते नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियाें के आगे गंभीर संकट होगा।
– आनंदवर्धन, प्रमुख सचिव, वन एवं पर्यावरण  

उत्तराखंड ही नहीं देश-दुनिया में पर्यावरण की स्थिति साल दर साल खराब हो रही है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा तो हो रही है, लेकिन योजनाओं को धरातल पर नहीं उतारा जा रहा है। पर्यावरण को यदि संरक्षित करना है तो इसके लिए हरेक व्यक्ति को अपने स्तर पर पहल करनी होगी। वरना वह दिन दूर नहीं जब मानव का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
– अनूप नौटियाल, संस्थापक, गति फाउंडेशन