Home अपना उत्तराखंड देहरादून कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से शुरू होने वाला महापर्व ‘छठ’ आज से शुरू…

कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से शुरू होने वाला महापर्व ‘छठ’ आज से शुरू…

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सूर्य की उपासना का महापर्व छठ (सूर्यषष्ठी) व्रत नहाय खाय के साथ आज से शुरू हो गया है। सूर्य उपासना के तीन दिवसीय महाव्रत को लेकर लोगों ने तैयारियां पूरी कर ली हैं। पहले दिन शुद्धता और पवित्रता के साथ व्रत का संकल्प लिया जाएगा। दूसरे दिन (पंचमी खरना) कुलदेवता की पूजा होगी।

कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठी पर जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। सूर्य को अर्घ्य देने के समय इस एक बात का ध्यान व्रतियों को जरूर रखना चाहिए। मान्यताओं के मुताबिक छठ महापर्व के दौरान पीतल से बने पात्र से ही अर्घ्य देना चाहिए। तांबे के पात्र से दूध का अर्घ्य नहीं देना चाहिए। वहीं, चांदी, स्टील, शीशा, और प्लास्टिक के पात्र वर्जित माने जाते हैं।

सूर्यदेव की पूजा के लिए बुधवार सुबह से देर रात तक घर और घाटों पर तैयारियां होती रहीं। प्रसाद व पूजा की सामग्री, सूप, डाला आदि की खरीदारी के लिए बाजारों में महिलाओं की काफी भीड़ रही। छह पर्व में शुद्धता का विशेष महत्व होता है। भगवान सूर्य की पूजा का प्रसाद बनाने के लिए चूल्हे की लकड़ी से लेकर बर्तन तक सभी को गंगाजल से पवित्र किया जाता है।

पूजन सामग्री बनाने के लिए फूल और पीतल के बर्तन उपयोग में लाए जाते हैं। व्रत करने से पहले घर-आंगन और व्रती का पवित्र होना जरूरी है। इसके लिए तीन दिनी व्रत के पहले दिन नहाय-खाय के दौरान गंगा स्नान कर व्रती महिलाएं व पुरुष स्वयं को पवित्र करते हैं। गंगाजल से पूरे घर को पवित्र किया जाता है। व्रत का पकवान गंगाजल से ही बनता है। दिनभर व्रत करने के बाद शाम को लौकी की सब्जी, अरहर की दाल, रोटी या चावल खाया जाता है।

दूसरे दिन पंचमी को व्रती एक समय बिना नमक का भोजन करते हैं। षष्ठी को निर्जला व्रत रह कर गंगा, यमुना जैसी नदियों या फिर सरोवर में कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सप्तमी की सुबह उगते सूरज को अर्घ्य देकर व्रत का पारण होता है। सूर्य षष्ठी व्रत की मुख्य शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खरना से मानी जाती है।

वेदाचार्यों के मुताबिक व्रत रखने वाले पूरे दिन निर्जला रहकर घर में पूजास्थल या कमरे में पूड़ी, रोटी और मीठा चावल बनाते हैं। बंद कमरे में गोधूलि बेला में पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद और जल ग्रहण किया जाता है। प्रसाद खाते समय किसी प्रकार का शोर न हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है। अगर इस समय तेज आवाज कान में पड़ जाए तो अशुभ माना जाता है।

छठ पूजा को ध्यान में रखते हुए बाजार में पूजा सामग्री की खरीदारी करने वाले ग्राहकों की आवाजाही शुरू हो गई। महिलाएं बांस के सूप, डाला, दौर, चकोदरा, गन्ना, नारियल, अर्तकपात खरीदती नजर आई।

एक नवंबर की सुबह छठव्रती और श्रद्धालु घर और पड़ोस की सफाई करेंगे। स्नान करके छठव्रती स्वंय रोटी, चावल का पिट्ठा, शक्कर की खीर बिना नमक वाला प्रसाद बनाएंगे। प्रसाद मिंट्टी के बर्तन में चूल्हे की आंच पर बनाया जाएगा। संध्या काल में छठव्रती घर में मिंट्टी की चुकड़ी, ढकना में प्रसाद, कसेली, पान का पत्ता, सिंदूर रखकर छठी मैया और सूर्य देवता की पूजा अर्चना करेंगी। इसी के साथ छठव्रतियों का 36 घंटे के लिए निर्जला व्रत आरंभ हो जाएगा।